अध्याय १३ : ब्राह्मण शाकाहारी क्यों बने?

एक समय था जब ब्राह्मण सब से अधिक गोमांसाहारी थे। कर्मकाण्ड के उस युग में शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो जब किसी यज्ञ के निमित्त गो वध न होता हो, और जिसमें कोई अब्राह्मण किसी ब्राह्मण को न बुलाता हो। ब्राह्मण के लिए हर दिन गोमांसाहार का दिन था। अपनी गोमांसा लालसा को छिपाने के लिए उसे गूढ़ बनाने का प्रयतन किया जाता था। इस रहस्यमय ठाठ बाट की कुछ जानकारी ऐतरेय ब्राह्मण में देखी जा सकती है। इस प्रकार के यज्ञ में भाग लेने वाले पुरोहितों की संख्या कुल सत्रह होती, और वे स्वाभाविक तौर पर मृत पशु की पूरी की पूरी लाश अपने लिए ही ले लेना चाहते। तो यजमान के घर के सभी सदस्यों से अपेक्षित होता कि वे यज्ञ की एक विधि के अन्तर्गत पशु के मांस पर से अपना अधिकार छोड़ दें।

ऐतरेय ब्राह्मण में जो कुछ कहा गया है उस से दो बातें असंदिग्ध तौर पर स्पष्ट होती हैं। एक तो यह कि बलि के पशु के सारा मांस ब्राह्मण ही ले लेते थे। और दूसरी यह कि पशुओं का वध करने के लिये ब्राह्मण स्वयं कसाई का काम करते थे।

तब फिर इस प्रकार के कसाई, गोमांसाहारियों ने पैंतरा क्यों बदला?

पहले बताया जा चुका है कि अशोक ने कभी गोहत्या के खिलाफ़ कोई का़नून नहीं बनाया। और यदि बनाया भी होता तो ब्राह्मण समुदाय एक बौद्ध सम्राट के का़नून को क्यों मानते? तो क्या मनु ने गोहत्या का निषेध किया था? तो क्या मनु ने कोई का़नून बनाया? मनुस्मृति के अध्याय ५ में खान पान के विषय में श्लोक मिलते हैं;

"बिना जीव को कष्ट पहुँचाये मांस प्राप्त नहीं किया जा सकता और प्राणियों के वध करने से स्वर्ग नहीं मिलता तो मनुष्य को चाहिये कि मांसाहार छोड़ दे।" (५.४८)

तो क्या इसी को मांसाहार के विरुद्ध निषेधाज्ञा माना जाय? मुझे ऐसा मानने में परेशानी है और मैं समझता हूँ कि ये श्लोक ब्राह्मणों के शाकाहारी बन जाने के बाद में जोड़े गये अंश हैं। क्योंकि मनुस्मृति के उसी अध्याय ५ के इस श्लोक के पहले करीब बीस पच्चीस श्लोक में विवरण है कि मांसाहार कैसे किया जाय, उदाहरण स्वरूप;

प्रजापति ने इस जगत को इस प्राण के अन्न रूप में बनाया है, सभी चराचर (जड़ व जीव) इस प्राण का भोजन हैं। (५.२८)

मांस खाने, मद्यपान तथा मैथुन में कोई दोष नहीं। यह प्राणियों का स्वभाव है पर उस से परहेज़ में महाफल है।(५.५६)

ब्राह्मणों द्वारा मंत्रो से पवित्र किया हुआ मांस खाना चाहिये और प्राणों का संकत होने पर अवश्य खाना चाहिये। (५.२७)

ब्रह्मा ने पशुओं को यज्ञो में बलि के लिये रचा है इसलिये यज्ञो में पशु वध को वध नहीं कहा जाता। (५.३९)

एक बार तय हो जाने पर जो मनुष्य (श्राद्ध आदि अवसर पर) मांसाहार नहीं करता वह इक्कीस जन्मो तक पशु योनि में जाता है। (५.३५)

स्पष्ट है कि मनु न मांसाहार का निषेध नहीं किया और गोहत्या का भी कहीं निषेध नहीं किया।मनु के विधान में पाप कर्म दो प्रकार के हैं;१) महापातक: ब्रह्म हत्या, मद्यपान, चोरी, गुरुपत्नीगमन ये चार अपराध महापातक हैं।और २) उपपातक: परस्त्रीगमन, स्वयं को बेचना, गुरु, माँ, बाप की उपेक्षा, पवित्र अग्नि का त्याग, पुत्र के पोषण से इंकार, दूषित मनुष्य से यज्ञ कराना और गोवध।

स्पष्ट है कि मनु की दृष्टि में गोवध मामूली अपराध था। और तभी निन्दनीय था जब गोवध बिना उचित और पर्याप्त कारण के हो। याज्ञवल्क्य ने भी ऐसा ही कहा है।

तो फिर आज के जैसी स्थिति कैसे पैदा हुई? कुछ लोग कहेंगे कि ये गो पूजा उसी अद्वैत दर्शन का परिणाम है जिसकी शिक्षा है कि समस्त विश्व में ब्रह्म व्याप्त है। मगर यह संतोषजनक नहीं है जो वेदांतसूत्र ब्रह्म के एकत्व की बात करते हैं वे यज्ञ के लिये पशु हत्या को वर्जित नहीं करते (२.१.२८)। और अगर ऐसा है भी तो यह आचरण सिर्फ़ गो तक सीमित क्यों सभी पशुओं पर क्यों नहीं लागू होता?

मेरे विचार से ये ब्राह्मणों के चातुर्य का एक अंग है कि वे गोमांसाहारी न रहकर गो पूजक बन गए। इस रहस्य का मूल बौद्ध-ब्राह्मण संघर्ष में छिपा है। उन के बीच तू डाल डाल मैं पात पात की होड़ भारतीय इतिहास की निर्णायक घटना है। दुर्भाग्य से इतिहासकारों ने इसे ज़्यादा महत्व नहीं दिया है। वे आम तौर पर इस तथ्य से अपरिचित होते हैं कि लगभग ४०० साल तक बौद्ध और ब्राह्मण एक दूसरे से बाजी मार ले जाने के लिए संघर्ष करते रहे।

एक समय था जब अधिकांश भारतवासी बौद्ध थे। और बौद्ध धर्म ने ब्राह्मणवाद पर ऐसे आक्रमण किए जो पहले किसी ने नहीं किए। बौद्ध धर्म के विस्तार के कारण ब्राह्मणों का प्रभुत्व न दरबार में रहा न जनता में। वे इस पराजय से पीड़ित थे और अपनी प्रतिष्ठा पुनः प्राप्त करने के प्रयत्नशील थे।

इसका एक ही उपाय था कि वे बौद्धों के जीवनदर्शन को अपनायें और उनसे भी चार कदम आगे बढ़ जायें। बुद्ध के परिनिर्वाण के बाद बौद्धों ने बुद्ध की मूर्तियां और स्तूप बनाने शुरु किये। ब्राह्मणों ने उनका अनुकरण किया। उन्होने शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि की मूर्तियां स्थापित करके उनके मंदिर बनाए। मकसद इतना ही था कि बुद्ध मूर्ति पूजा से प्रभावित जनता को अपनी ओर आकर्षित करें। जिन मंदिरों और मूर्तियों का हिन्दू धर्म में कोई स्थान न था उनके लिए स्थान बना।

गोवध के बारे में बौद्धों की आपत्ति का जनता पर प्रभाव पड़ने के दो कारण थे कि एक तो वे लोग कृषि प्रधान थे और दूसरे गो बहुत उपयोगी थे। और उसी वजह से ब्राह्मण गोघातक समझे जाकर घृणा के पात्र बन गए थे।

गोमांसाहार छोड़ कर ब्राह्मणों का उद्देश्य बौद्ध भिक्षुओं से उनकी श्रेष्ठता छीन लेना ही था। और बिना शाकाहारी बने वह पुनः उस स्थान को प्राप्त नहीं पर सकता था जो बौद्धों के आने के बाद उसके पैर के नीचे से खिसक गया था। इसीलिए ब्राह्मण बौद्ध भिक्षुओं से भी एक कदम आगे जा कर शाकाहारी बन गए। यह एक कुटिल चाल थी क्योंकि बौद्ध शाकाहारी नहीं थे। हो सकता है कि ये जानकर कुछ लोग आश्चर्य करें पर यह सच है। बौद्ध त्रिकोटी परिशुद्ध मांस खा सकते थे।यानी ऐसे पशु को जिसे उनके लिए मारा गया ऐसा देखा न हो, सुना न हो और न ही कोई अन्य संदेह हो। इसके अलावा वे दो अन्य प्रकार का मांस और खा सकते थे- ऐसे पशु का जिसकी स्वाभाविक मृत्यु हुई हो या जिसे किसी अन्य वन्य पशु पक्षी ने मार दिया हो।

तो इस प्रकार के शुद्ध किए हुए मांस खाने वाले बौद्धों से मुकाबले के लिए मांसाहारी ब्राह्मणों को मांस छोड़ने की क्या आवश्यक्ता थी। थी, क्योंकि वे जनता की दृष्टि में बौद्धों के साथ एक समान तल पर खड़े नहीं होना चाहते थे। यह अति को प्रचण्ड से पराजित करने की नीति है। यह वह युद्ध नीति है जिसका उपयोग वामपंथियों को हटाने के लिए सभी दक्षिणपंथी करते हैं।

एक और प्रमाण है कि उन्होने ऐसा बौद्धों को परास्त करने के लिए ही किया। यह वह स्थिति बनी जब गोवध महापातक बन गया। भण्डारकर जी लिखते हैं कि, "हमारे पास एक ताम्र पत्र है जो कि गुप्त राजवंश के स्कंदगुप्त के राज्यकाल का है। यह एक दान पात्र है जिसके अंतिम श्लोक में लिखा है : जो भी इस प्रदत्तदान में हस्तक्षेप करेगा वह गो हत्या, गुरुहत्या, या ब्राह्मण हत्या जैसे पाप का भागी होगा।" हमने ऊपर देखा है कि मनु ने गोवध को उपपातक माना है। मगर स्कन्द गुप्त के काल (४१२ ईसवी) तक आते आते महापातक बन गया।

हमारा विश्लेषण है कि बौद्ध भिक्षुओ पर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ब्राह्मणों के लिए यह अनिवार्य हो गया था कि वे वैदिक धर्म के एक अंश से अपना पीछा छुड़ा लें। यह एक साधन था जिसे ब्राह्मणों ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पाने के लिए उपयोग किया।

54 टिप्‍पणियां:

JYOTIRADITYA ने कहा…

There has been lot of interpolation in the vedic text . Due to rule of buddhist for thousand yrs . many stories , shloka has been inserted inbetween .its a known fact a victor write the hisotry ,same thing happened at the time of buddhist rulers, so dont get blient by what ambedkar has written , he was again a buddhist

kaushal ने कहा…

That was a foolish artical,
i am requisting you to don't miss guide the indian peoples.

minee ने कहा…

abhay tiwari you are totaly a foolish man . your interuption of the history cast system is as illiterate. you should know hindus are the great philosphers, scientists ,inventers of cultures and in all rigion first in the world. do you can say criticaly about islam , jesus . do you rasdi and tslima . do you think so you have no write to criticise hinduism . i am proud of hinduism . your eassy is sameful . you change you name why you will think . i am 15 year old girl. minee tripathi .maihar satna mp.

brijmohan ने कहा…

me minee se poori tarah se sahmat hun.ye tiwari ji wo nahi hain jo aap soch rahe hain.
brijmohan

Bharat Bhushan Singh Suryavanshi ने कहा…

bahut badey maadharchod ho tum bahan k laodey....teri maa ko chodu......bhadve.......Ambedkar kya teri maa ka khasam tha jo bahanchod jo likh de vo hi SATYA maan liya jaaye......

Rakesh Mohan Shukla ने कहा…

foolish article

raja ram ने कहा…

harimiyo ki aulad harami hi rahti hai ..tum sale kabhi nahi sudharoge .apne sath apni 108 peediyo ko nark me le jaa rahe ho .yahi tumahara dand hai .

Hemendra Nagar ने कहा…

mansik dwesh ke siway or kuch nahi
ho sakta hai brihamins ya hindutva se aap khfa hai!

Anil ने कहा…

yeh ek shajish ka hissa hai jo anek roopo me saamne aati rahati hai.......

Anil ने कहा…

yeh ek shajish ka hissa hai jo anek roopo me saamne aati rahati hai.......

Anil ने कहा…

yeh ek shajish ka hissa hai jo anek roopo me saamne aati rahati hai.......

Real Vidrohee ने कहा…

डॉ. आंबेडकर छुआ-छूत के खिलाफ प्रयास करते रहे. इस कु-रीती कॉ समाप्त कर अछूतोंको हिंदूधर्म में समान दर्जा प्राप्त हो यह आप का प्रयत्न था. महाड के तालाब का पानी पीने का - छूनेका अधिकार सबको मिले, इस हेतु किया गया सत्याग्रह, मंदिर प्रवेश के लिए सत्याग्रह आपने किए. किंतु समाज की कुंठा के कारण यश नही मिला. वे क्रोधित हुए और घोषणा की - हिंदू के रूप में नही मरूंगा - और बौद्ध धर्म को अपनाया. इसके बाद आप ने पूरा जीवन हिंदू धर्म पर प्रहार और बौद्ध धर्म की प्रशस्ती में लगाया. अपनी विद्वत्ता का प्रयोग इस हेतु किया. मुझे इतिहास-विद् श्री. गजानन खरे के एक पुराना स्फुटलेख याद है - श्री खरे डॉ. आंबेडकरको एक समारोहमें भाषण देनेके लिए आमंत्रित करने आप के घर गए थे. तब आप ने श्री खरे को कहा था - आप जो चाहे कहो, मै हिंदू और ब्राह्मणो के खिलाफ किसी न किसी ग्रंथ से सबूत जुटा कर अपनी बात रखूंगा. इस लिए जरूरी है की मनु-स्मृती अथवा ऐतरेय उपनिषद की जो बाते कही गयी है, उनका पूर्वग्रहरहित अभ्यास हो.

udaymala sahil ने कहा…

YE SAB SAHI LIKHA HAI MAI ISASE SAHAMAT HUN AUR YE BRAMHAN KA MATALAB HAI (BRA) AUR (MAN)

udaymala sahil ने कहा…

YE SAB SAHI LIKHA HAI MAI ISASE SAHAMAT HUN AUR YE BRAMHAN KA MATALAB HAI (BRA) AUR (MAN)

krishna joshi ने कहा…

sab bakwash hai konse puran ya ved me esa likha hai brahmano pe esa stetush mat likhiye ...........

Jai Prakash ने कहा…

good article.....

HARESH JOSHI ने कहा…

Chutia sala harami rakxs likhne vala

HARESH JOSHI ने कहा…

Chutia sala harami rakxs likhne vala

sunildutt ने कहा…

बकवास है ये

manojkumar ने कहा…

Good article

भारतीय ने कहा…

Good article, ....

BHAU Joshi ने कहा…

likhna na hai sach likho pagal faltu bakwas mat karo

BHAU Joshi ने कहा…

likhna na hai sach likho pagal faltu bakwas mat karo

monika sharma Jaipur ने कहा…

ये सच है पहले इनसान शीकार से जीता था

sonam kumari ने कहा…

Sahi baat hai,, pehle aadmi non-veg hi tha,hum hindu samajhte hai ki hum dhoodh ke dhule hai....

fir aaj bhi brahmans sc walo se bahut jalate hai,,yehi iska proof hai jo aaj bhi asani se mil jata hai..

डॉ. कौशलेन्द्रम ने कहा…

अंबेडकर का चिंतन घृणा आधारित होने के कारण अतिवादी और एकांगी हो गया था यही कारण है कि उनका लिखा हुआ पढ़ने वाले लोगों का अभाव है । यह लगभग उसी तरह है जिस तरह पाकिस्तान का जन्म जो कि हिंदू विद्वेष और घृणा के आधार पर हुआ था । घृणा आधारित कोई भी विचार या उत्पाद स्थायी नहीं हो सकता ।

nitin mishra ने कहा…

you ar a robish an

nitin mishra ने कहा…

tu o ab pata hi nahi hai to kkya bolte ho murkh

vaibhav joshi ने कहा…

भेनचोद ये पुस्तक जलाकर राख करनी चाहिए कुछ भी लिखा है बेहेन के लौड़े ने

vaibhav joshi ने कहा…

भेनचोद ये पुस्तक जलाकर राख करनी चाहिए कुछ भी लिखा है बेहेन के लौड़े ने

Vinod Ahire ने कहा…

सभी को निवेदन है की इसे तटस्थ रहके सोचे ये इतिहास है और जिनको आपत्ति है वो इसे जूठा साबित करे और ब्राह्मणोंको गाली देना शोभा नही देता विष्णु नाराज होगा. सबका मंगल हो.

rahul asthana ने कहा…

Ambedkar lawda tha aur lawda he rahega. Zinda hota to uska mutrabhishek main he karta.

pandey... ने कहा…

Sale tu markswad ki paidaish h naa.. sach bata na... communist haramkhoro ne tujhse ye sab jabardasti karawaya naa..

pandey... ने कहा…

Sale tu markswad ki paidaish h naa.. sach bata na... communist haramkhoro ne tujhse ye sab jabardasti karawaya naa..

चक्रपाणि मिश्रा ने कहा…

तुम्हारी ऐसी सोच व मन गढ़न्त लिखने से एक तो द्वेषता साफ नजर आ रही है दूसरी बात ये है की अम्बेडकर को और कुर्बान हुए उन शहिंदो की आत्मा को भी ठेस पहुंचती है|जिन्होंने देश को आजादी दिलवाई और आपसी भाईचारे को एकता के सूत्र में बांधने की कोशिश में और राष्ट्र के निर्माण में शहीद हो गए और तुम फिर फूट डालने की कोशिश कर रहे हो|यदि तुम हिंदु का खुन हो तो अम्बेडकर की तरह अपने राष्ट्र को और मजबुत (एकता)बनाने की कोशिश करो तो ज्यादा अच्छा है| हमारे भारत वर्ष की एकता और अंखडता को तार-तार करने वाला हिंदु का खुन नहीं हो सकता|तुमने स्वाध्याय पुरा नहीं किया या तुम्हे इतिहास का पुरा ज्ञान नहीं है या फिर तुम नादान हो या फिर गलती तुम्हारे उस पडौसी मुसलमान की है जिसने पहले कभी गलती की थी और तुम उसकी गलती का परिणाम हो|क्यों कि जो व्यक्ति भारत की एकता पर ऊँगली उठाएगा तो उसे हम दुनिया से उठा देंगे| हमारा हिंदुस्तान जिंदाबाद था,जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा| जा उखाड़ ले क्या उखाड़ता है|तेरे को जो उखाड़ना है|

B.P.CHATURVEDI ने कहा…

वेद क्या यह यह अंबेडकर को क्या पता

B.P.CHATURVEDI ने कहा…

वेद क्या यह यह अंबेडकर को क्या पता

Kunal Sarswat ने कहा…

Ambedkar ne chiting kiya hai. Vo khud saf suthra nahi rahta tha. Isliye sab use sath nahi rakhte the, usne school b bahar baith k puri ki, baki ki padhai b shre shahu maharaj se bhik(paise) mang k india k bahr jake kiya aur baki sab ko bhik mangnae ko bolta h, matlab aarkshan mangane bolta h..ab gande admi ko kon sath rakhta h. Use ye taklif ki vajah se bahut sare hinduo m darar dal diya hai..bahut sare hinduo ko bola ap achut ho magar aisa kuch nahi h, sare ek jaise h..achut u to sirf ambedkar tha. Mhar logo ko bahut manyata thi. Agar bramhin ki aur baki logo ke bich agar kuch uch-nich ka bhed hota to ambedkar ko ambedkar naam kisne diya, uska sahi naam bhimrao sakpal hai, videsh jake vahaki bato ko yaha copy-paste kiya, unki wife b bramhin thi, agar uch nich hota to kya bramhin ki beti use koi deta, agar koi bhagake b le gaya to use hum maar dete..ye sab chutiya giri hai..

nandkumar Thorat ने कहा…

This article is 100% true..this fact..ignorance of reality/truth...nt change d history....

sushil ने कहा…

अंबेडकर के लिखे वाक्य तुम पढ़ो और तुम्ही समझो वह स्वम् येक पियक्कड़ था और दारू पी कर ही मरा भी तो येसे लोगो की बात पर हमें यकीन करने की कोई जरूरत नही

sushil ने कहा…

अंबेडकर के लिखे वाक्य तुम पढ़ो और तुम्ही समझो वह स्वम् येक पियक्कड़ था और दारू पी कर ही मरा भी तो येसे लोगो की बात पर हमें यकीन करने की कोई जरूरत नही

sushil ने कहा…

अंबेडकर के लिखे वाक्य तुम पढ़ो और तुम्ही समझो वह स्वम् येक पियक्कड़ था और दारू पी कर ही मरा भी तो येसे लोगो की बात पर हमें यकीन करने की कोई जरूरत नही

Umesh Paliwal ने कहा…

Ambedkar ne kha se Pta kiya he Sb uska baap vedik kaal me peda hua tha

Unknown ने कहा…

bhai ladna choro ye sab bakwas hai desh ki tarakki me sath do kisi itihas me na jao aaj me jiyo thodi si umar hai khush ho ke ji lo jo likha he koi jaroori nahin hai sahi hi hoga isliye post me kya likha hai usme mat jao ye vote bank ki rajniti ka post hai atah aap logo se nivedan he ki bramit na ho or logo ko bhramit hone se bachao aaj ki pidhi ko pata he kya acha he kya galat india bahut aage ja raha he aur aap bhi kadam se kadam mila ke chalo

Ashok Parmar ने कहा…

Jul gayee

Ashok Parmar ने कहा…

Tu he kon ambedkar ke bare me janta kya hae

Ashok Parmar ने कहा…

Teri ma ki bhos me kar

Konark Joshi ने कहा…

Ambetkar was a chill mind politician why he don't changed his name Bhim rao its a Hindu name he died as a shame less .again how he got to studies foreign policy or law just by Indian rajas who gave him right to get educate he was just nobudy without it .he completed his baristary to be on a position in British & he did all the propaganda to insult Hindustan

Kusum chauhan ने कहा…

You are right sir , I am fully agree with you , nice post

arvind kumar ने कहा…

Kisi ke baare me comment karne se pahle unke achievement to dekh liya karo.

arvind kumar ने कहा…

Unke bare me insult ka matlab Columbia,Cambridge aur Britain university ki insult

arvind kumar ने कहा…

Kisi ne manu ke bare me nhi likha ki manu kaun hote hain dharm banane wale ?

A K Dixit ने कहा…

A. K. Dixit
Ambedkar converted to Buddhism along with his followers. His criticism or objection to Sanatan Dharm came to end with that. He was and his followers are free to improvise/ criticise/ amend /change Buddhism as deemed fit. They are just not concernred with Sanatan Dharm or Hinduism. We are free to take care of it as deemed fit. Just by the way he tolerated well eating non-veg by Bauddha Bhikshus. How come?

mahee ने कहा…

I have a question why a Bramhins dont call himself a Hindu??
Why a bramhin think himself apart from hindu.